कतिपय राष्ट्रव्यापी समस्याओं के समाधान में वैदिक धर्म की चिन्तन दृष्टि
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Keywords

वैदिक धर्म
साम्प्रदायिकता
जातिवाद
, क्षेत्रवाद
आतंकवाद

How to Cite

.श., & बाजपेयीर. (2012). कतिपय राष्ट्रव्यापी समस्याओं के समाधान में वैदिक धर्म की चिन्तन दृष्टि. Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal, 1, 42-49. https://doi.org/10.36018/dsiij.v1i.9

Abstract

संवेदना को परिष्कृत करने वाली विधा का नाम धर्म है। वैदिक साहित्य के अनुसार मनुष्य जीवन को सफल तथा समाज को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाने की जो सर्वोच्च आचार संहिता है उसे धर्म के नाम से जाना जाता है। धर्मवेत्ता वह है जो सर्वश्रेष्ठ मानवीय गुणों से सुसंपन्न है तथा समस्त मानव जाति को एक परमात्मा की संतान मानता है। जो तत्व प्राणियों द्वारा धारण किया जाता है तथा इसके द्वारा वह प्राणियों का पालन-पोषण करता हुआ उन्हें सुख-शांति से आप्यायित करता है व अवलंबन देता है उसे धर्म कहते हैं। इस प्रकार सारी विश्व मानवता के लिए धर्म एक ही हुआ, जिसके मार्गदर्शन, संरक्षण में जिसकी छाया तले सभी प्रकार की विचारधारायें समान रूप से पोषण पाती रहें, पारस्परिक कोई विग्रह न हो, वह धर्म शाश्वत है व एक ही है। देवसंस्कृति इस संबंध में हमारा मार्गदर्शन आज की साम्प्रदायिक विद्वेष भरी परिस्थितियों में समुचित रीति-नीति से करती हुई कहती है कि वही धर्म कहलाने योग्य है जो सहिष्णु हो, जिसकी मर्यादा-अनुशासन का अवलम्बन सब लें, जो नीतिमत्ता पर आधारित हो तथा जो सबको समान संरक्षण प्रदान करती हो। परंतु आज धर्म का यह वास्तविक स्वरूप विलुप्त हो गया है, धर्म मात्र कर्मकाण्ड बनकर रह गया है। धर्म के नाम पर सर्वत्र अंधविश्वास फैला हुआ है। धर्म के वास्तविक स्वरूप से दूर होने के कारण आज समाज में अनेक समस्याएंँ उत्पन्न हो गयी हैं। धार्मिक कट्टरता के कारण साम्प्रदायिकता ने जन्म लिया है। इसके अतिरिक्त जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी समस्याएँ समाज को विकृत करती चली जा रही हैं। आतंकवाद का दंश तो भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व झेलने के लिए विवश है। इन समस्याओं के समाधान में वैदिक धर्म की महती भूमिका है। यदि मानव मात्र धर्म के वास्तविक स्वरूप (वैदिक धर्म) को अपने जीवन में अंगीकार कर ले तो उपरोक्त समस्याओं से निजात पा सकना संभव है। वैदिक ग्रंथों में धार्मिक सद्भाव एवं धार्मिक सामंजस्य का उल्लेख प्राप्त होता है। धार्मिक सद्भाव का तात्पर्य है अन्य धर्म सम्प्रदायों को भी अपने धर्म के समान आदर व प्रेम की भावना को प्रश्रय देना। इस भावना के अवलंबन में सम्प्रदायवाद की समस्या का समाधान निहित है। धार्मिक सामंजस्य का तात्पर्य है व्यक्ति व व्यक्ति के मध्य संकीर्ण, स्वार्थपरक मनोवृत्तियों व मनोभावों के स्थान पर ’’आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ व ’’वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना का विकास अर्थात् जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अपने समान और संपूर्ण वसुधा को अपने परिवार के समान समझेगा तो समस्त प्रकार के विद्वेष स्वतः ही समाप्त हो जायेंगे परिणामतः जातिवाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद जैसी समस्याओं का निर्मूलन संभव हो सकेगा। इस प्रकार वैदिक धर्म सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है।

https://doi.org/10.36018/dsiij.v1i.9
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References

अर्तिस्तुहुमिति उणाम् इति मन्। सिद्धांत कौमुदी-1/139

अयंधर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्यसर्वाणि भूतानानि मधुयश्चायमस्मिन् धर्मतेजोमयोऽमृतमयः पुरूषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरूषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मदं सर्वम्।। (वृहदारण्यक उपनिषद्-2/5/11)

अतो धर्माणि धारयन्।। (ऋग्वेद- 1/22/18)

अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि।। (अथर्ववेद-3/8/5)

अस्मै कामायोप कामिनीर्विश्वे वो देवा उपसंयन्तु।। (अथर्ववेद-3/8/4)

ओम् ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।। (ऋग्वेद, म द्गलोपनिषद- पुरुषसूक्त/12)

इहेदसाथ न परो गमाथेर्यो गोपाः पुष्टपतिर्व आजत्। एक वर्णमिदं पूर्व विश्वमासीद युधिष्ठिरः। कर्मक्रियाविभेदेन चातुर्वण्य प्रतिष्ठितः।। महाभारत-42/188

तस्मात् शीलं प्रधानेष्टं विदुर्येतत्वदर्शिनः।। महाभारत-180/32/33

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।। (ऋग्वेद-8/49/2)

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रयनिग्रहः। धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा। (तैत्तिरीय आरण्यक- 10/63)

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।। (मनुस्मृति 6/91)

प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्य शवसानाय साम। सं वो मनांसि येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चंतों अङिरसो गा अविंदन्।। (ऋग्वेद- 1/62/2)

सं व्रता समाकूतीर्ननमासि। सङ्च्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। सत्यं वद। धर्मं चर। (तैत्तिरीय उपनिषद्- 1/11/1)

सत्यधर्माय दृष्ट्ये। (ईशावास्योपनिषद्-15)

सर्वेसर्वास्वपत्यानि जनयंति सदा नराः। त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। समाशँसते धर्मेण यथा राज्ञैव यो वै धर्म सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं वदंत माहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदंत सत्यं वदतीत्येतद्धयेवै तदुभयं भवति।। (वृहदारण्यक उपनिषद्-1/4/14)

त्रयो धर्मस्कंधा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यंतमात्मानआचार्यकुलेऽवसादयन्सव एते पुण्यलोका भवंति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति।। छांदोग्य उपनिषद्-2/23/1

चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। (श्रीमद्भगवद्गीता-4/13)

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