आपदाकाल में सकारात्मक संचार : कोरोना संकट काल के विशेष संदर्भ में एक अध्ययन
Research article
DOI: 10.36018/dsiij.v16i.165

आपदाकाल में सकारात्मक संचार : कोरोना संकट काल के विशेष संदर्भ में एक अध्ययन: Study of Positive communication during a disaster: With the special reference to the COVID19 pandemic

Research Scholar, Department of Journalism and Mass Communication, Dev Sanskriti University, Haridwar, India
Lecturer, Department of Yoga & Health, Dev Sanskriti University, Haridwar, India
आपदा सकारात्मक संचार सकारात्मक पत्रकारिता Disaster Positive Communication Positive Journalism COVID19

Abstract

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जबकि समाज परिवर्तनशील है। सामाजिक परिवर्तन कई बार मानव के लिए सुखद परिस्थिति लाता है तो कई बार संकट कालीन स्थिति। आपदा काल में मनुष्य को ऐसे ही संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसे संकट काल से उबरने में समाज को कई बार काफी समय लगता है, तो कई बार वह जल्द ही परिस्थितियों को अनुकूल बना लेता है। ऐसे आपदाकाल की विषम परिस्थितियों को अनुकूल बनाने में सकारात्मक संचार का विशेष योगदान रहा है। वर्तमान में पूरा विश्व कोरोना वायरस के संकट से गुजर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे जनवरी 2020 में वैश्विक आपदा घोषित किया है। भारत भी कोरोना संकट से अछूता नहीं रहा। भारत में २२ मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके बाद से ही पूरे भारत में लॉकडाउन का क्रम जारी हुआ और इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया। भारतीय जनता ने प्रथम बार ऐसे संकट का सामना किया। जिसमें उसे ज्ञात ही नहीं की ऐसे संकट से कैसे उबरा जाए। सुनसान सडकें, सुनसान गांव-शहर, मानो मानव पिजड़े में कैद हो। ऐसा दृश्य इससे पहले कभी किसी ने नहीं देखा। ऐसे समय में संचार-सूचनाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान होता है। जैसी सूचना होगी, जैसा संचार होगा मनुष्य उसी ओर आकर्षित होता है। पत्रकारिता के माध्यम से जनसंचार होता है एवं सूचनाएं सभी तक पहुंचती हैं। ऐसे में सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों तरह के संचार देखने को मिलें। नकारात्मक संचार जहां भय, तनाव, हिंसा आदि के भाव जगाता है वहीं सकारात्मक संचार निर्भयता, साहस, सुख-आनन्द, आदि का संचार करता है। यहां सकारात्मक संचार के उदाहरणों से यह समझने का प्रयास किया गया कि संकट काल में किस-किस तरह के सकारात्मक संचार संभव है। कोरोना संकट काल में सकारात्मक संचार की भूमिका का अध्ययन किया गया है।

Man is the Social animal of the constantly changing society. Social changes sometimes bring pleasant conditions for human beings and sometimes crises. In a disaster, human beings face similar crises. It often takes a lot of time for society to recover from such a crisis; many times it makes the conditions favorable again. In such a disaster, positive communication has played a special role in adapting to the crisis. Currently, the whole world is going through the crisis of coronavirus COVID19 pandemic (in the first half of year 2020). The World Health Organization declared it as a global disaster in January 2020. India also not remained untouched by the COVID19 pandemic. Janata Karfu (self-imposed quarantine) was imposed in India on 22 March 2020. Since then the order of lockdown was issued throughout India and it was declared as a national disaster. The Indian public has not faced such a crisis in modern times and they do not know how to overcome such a crisis. Deserted roads, deserted villages - cities, as if imprisoned in humans are resultant of the corona crisis period. No one has ever seen such a scene before. In such times, communication and information make a very important contribution. People are attracted by the nature of information and communication takes place.  Mass communication carries through journalism and information reaches everyone. In such a situation, both positive and negative communication should be seen. While negative communication awakens feelings of fear, tension, violence, alertness to some extent, etc., positive communication brings fearlessness, courage, happiness, joy, etc. In this research paper researchers due have given rationale examples of positive communication. Through this paper, researchers have explored the various role of positive communication in a possible crisis time. The role and presence of positive communication during Corona crisis period studied in this paper.

 

भूमिका

आपदा का तात्पर्य प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से होने वाली दुर्घटना, आपदा या गंभीर घटना से है जिसे प्रभावित समुदाय द्वारा तुरंत रोका या निपटाया नहीं जा सकता है। भूकंप, चक्रवात, सूखा, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं में से कुछ हैं, जिसके परिणामस्वरूप जान और माल की भारी हानि होती है। आपदाओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव, प्राकृतिक या मानव निर्मित, व्यापक क्षति, विनाश और मृत्यु है।

एक आपदा एक आकस्मिक घटना है, जो किसी समुदाय या समाज के कामकाज को गंभीर रूप से परेशान करती है और मानव, सामग्री, और पर्यावरणीय नुकसान का कारण बनती है जो समुदाय या समाज के अपने संसाधनों का उपयोग करने की क्षमता से अधिक होती है। हालांकि अक्सर प्रकृति के कारण आपदाएँ होती हैं किन्तु मानव द्वारा भी आपदाओं की उत्त्पति हो सकती है जैसे कि मानव लापरवाही के कारण परमाणु संयंत्र में बड़ी आग या रिसाव।

अचानक होने वाली भयावह और विध्वंशकारी घटना जिससे बड़े स्तर पर भौतिक क्षति होती है और भारी जान-माल का नुकसान होता है। अर्थात आपदा से तात्पर्य किसी क्षेत्र में हुई उन गंभीर घटनाओं से है, जो या तो मानव निर्मित कारणों से घटित होती हैं या फिर प्राकृतिक कारणों से घटित होती हैं और जिन घटनाओं से बहुत बड़ी मात्रा में मानव जीवन को नुकसान पहुंचता है, मानव पीड़ित होता है और करोड़ों-अरबों की संपत्ति का नुकसान होता है, साथ ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और जिन्हें प्रभावित समुदाय द्वारा तत्काल प्रभाव से नहीं रोका जा सकता है (1)।

आपदाओं के प्रकार

मुख्यतः दो प्रमुख प्रकार हैं 1) प्राकृतिक आपदा- प्राकृतिक आपदाएं प्राकृतिक कारणों से होने वाली आपदाएं हैं जो बाढ़, तूफान, भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट सहित मनुष्यों के नियंत्रण से परे हैं जिनका मानव जीवन पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। 2) मानव निर्मित आपदा- मानव निर्मित आपदाओं को जटिल आपात स्थितियों के रूप में भी जाना जाता है, जो प्रमुख दुर्घटनाओं के कारण होती हैं जैसे कि आग, अधिकार का हनन, लूटपाट और हमले, संघर्ष की स्थिति और युद्ध सहित।

आपदाओं से नुकसान

आपदाएं चाहे प्राकृतिक हों या फिर मानव निर्मित हों, यह किसी भी देश की उन्नति के लिए बाधक होती हैं, और उस राष्ट्र को कई साल पीछे धकेल देती हैं। इसके साथ ही इन आपदाओं में न जाने कितने लोगों की जान चली जाती हैं, और करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट हो जाती हैं।

सकारात्मक संचार

ज्ञान के विकास, मनुष्य की उत्कृष्टता, सभ्यता के विकास, मानव को सभ्य बनाने के लिए किया गया संचार सकारात्मक संचार है। मनुष्य के परिष्कार, समाज निर्माण, समाज उत्थान, पुर्नजागरण, मूल्यों की स्थापना, ज्ञान के विकास, विज्ञान के विकास, मिशन के लिए किया गया संचार सकारात्मक संचार है। सृजन के लिए किया गया संचार सकारात्मक संचार है, प्रगति के लिए किया गया संचार सकारात्मक संचार है, विकास के लिए किया गया संचार सकारात्मक संचार है। जो संचार विध्वंश को नहीं सृजन को जन्म देता है, जो संचार पतन, पराभाव को नहीं प्रगति, उत्कर्ष के पथ पर आगे बढ़ता है, जो संचार विनाश का नहीं विकास का मार्ग प्रशस्त करता है, वह सकारात्मक संचार है।

इस संचार में मूल्यों की स्थापना के लिए संवाद की प्रक्रिया है, मानवीय मूल्य, समाजिक मूल्य, नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए संवाद होता है। यह संचार हमें अनीति, अनाचार, भ्रष्टाचार से दूर कर सदाचार, सच्चाई और सत्कर्म की ओर ले जाता है। साथ ही यह ऐसी संचार प्रणाली हैं जिसे हर व्यक्ति अपना सकता है, जो पूरी मानव जाति के लिए लागू किया जा सकता है। व्यक्ति एवं समाज को उत्कृष्ट बनाने की प्रक्रिया सकारात्मक संचार है। सकारात्मक विचारों का व्यक्तित्व प्रत्येक मनुष्य को अपनी तरफ आकर्षित करता है। सकारात्मक होना न सिर्फ व्यक्तित्व का आकर्षण है वरण वह शील गुण भी है जिसके माध्यम से कोई भी मनुष्य अपने आस-पास सकारात्मक माहौल को सृजित कर सकता है। अगर साहित्यिक शब्दों में कहा जाए तो सकारात्मक संचार सृजन, प्रगति, विकास, निर्भयता, भय मुक्त, साहस इत्यादि गुणों के प्रसारण के साथ-साथ संस्कारों का परिष्कार, प्रकृति से प्रेम, समस्या नहीं अपितु समाधान को जन-जन के मन-मन तक उतरकर समाज को परिमार्जित करने की प्रक्रिया है।

सकारात्मक संचार के दो पक्ष है

1.सकारात्मक समाजिक परिवर्तन

2.परम्परागत समपोषण सहित नैतिक मूल्यों का समाजिकरण

समाजिक परिवर्तन चाहे जैसा भी हो उसका स्वरूप सकारात्मक ही होता है। समाजिक परिवर्तन का उद्देश्य समुदाय में व्याप्त अशिक्षा, असमानता, गरीबी आदि को खत्म करना होता है। सकारात्मक संचार द्वारा समाज को बदलाव के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ विकास की गति देते हुए समाजिक स्तर पर सकारात्मक समरसता सहित सार्थक महौल बनाना होता है, साथ ही वर्षों से चली आ रही समाजिक परम्पराओं का सम्मान करते हुए एवं उसका पोषण करते हुए समुदाय के समस्त समूहों को एकता के सूत्र में पिरोते हुए उन्हें सार्थक समाजिकरण के मार्ग पर उत्प्रेरित करना भी सकारात्मक संचार का एक परम उद्देश्य होता है। समाजशास्त्र की दृष्टि ये यह किसी भी राष्ट्र के सभ्यता एवं संस्कृति के पथ को प्रशस्त करने का प्रयत्न कहा जा सकता है (2)।

सकारात्मक पत्रकारिता

‘‘खींचो ना कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’’। अकबर इलाहाबादी का यह कथन यही दर्शाता है कि पत्रकारिता की ताकत, किसी तोप से कम नहीं। पत्रकारिता की इसी ताकत ने संसार भर के देशों के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई और उन्होंने आजादी पाई।

यही सकारात्मक पत्रकारिता है, जो वर्तमान समस्याओं का समाधान सुझाए। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण जिसका आधार हो। ऐसी पत्रकारिता जो प्रेरणा प्रद जीवन को दिशा देने वाली हो, जिसमें सेवा एवं मिशन का भाव हो। जिसका लक्ष्य मनुष्य के नैतिक मूल्यों, मानवीय मूल्यों, समाजिक-अध्यात्मिक मूल्यों को स्थापित करना हो।

आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा नकारात्मकता और सनसनी फैलाने का पर्याय बनता जा रहा है, ऐसे में सकारात्मक पत्रकारिता समय की मांग है। संपादकों को संबोधित करते हुए एक बार भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति स्व. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था मीडिया में खबरें ऐसी नहीं हो जिसे पढ़कर लोगों में निराशा इस कदर घर कर जाए की जीने का मन ही न करे, बल्कि खबरें ऐसी हों जो लोगों में आशा एवं उत्साह जीवन का संचार कर सकें। सकारात्मक पत्रकारिता का महत्व रेखांकित करते हुए 24 अप्रैल 2016 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी मन की बात में कहते है, ‘‘पाजिटिव खबरें ही देश में सकारात्मकता का मौहाल बना सकती हैं। बड़े से बड़ा व्यक्ति, उत्तम से उत्तम बात, अच्छे से अच्छे शब्दों में बढ़िया से बढ़िया तरीके से बताऐ, तो भी उसका उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना किसी अच्छी खबर का पड़ता है। अच्छी खबरें प्रेरणा का सबसे बड़ा कारण बनती हैं।’’ इस प्रकार प्रधानमंत्री जी ने सकरात्मक पत्रकारिता की दिशा में प्रयासरत मीडिया की सराहना की तथा इस दिशा में और सार्थक कदम उठाने की अपील की।

भारतीय पुस्तकों यथा - पत्रकारिता के विविध आयाम, वेद प्रताप वैदिक भाग-1 वर्ष 2002, सांस्कृतिक पत्रकारिता- डॉ. टीडीएस आलोक वर्ष 2003, मीडिया और संस्कृति - रूप चन्द गौतम वर्ष 2008, पत्रकारिता की लक्ष्मणरेखा- आलोक मेहता वर्ष 2008 में सकारात्मक पत्रकारिता के कुछ संकेत मिलते हैं। पत्रकारिता जगत की जागृत दिव्य आत्माओं ने पत्रकारिता के नकारात्मक स्वरूप से लोहा लेने की जोरदार पहल की। सकारात्मक पत्रकारिता की दिशा में प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक एवं न्यू मीडिया तीनों में ही कुछ न कुछ प्रयास निरंतर जारी है (3) (4)।

कोरोना संकट काल में सकारात्मक पत्रकारिता द्वारा सकारात्मक संचार के उदाहरण-

स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की ओर बढ़ते कदम

भारत का वर्षों पुराना सपना ‘‘स्वच्छ भारत हो अपना’’ साकार होता दिखाई दे रहा है, सभी मुहल्ले, गांव, शहर स्वच्छ नजर आ रहे है, स्वच्छता मनुष्य की प्राथमिकता बन गई है। सभी अपने-अपने घर एवं आसपास की सफाई का विशेष ध्यान रखते है। व्यक्ति में जगह-जगह गंदगी फैलाने की प्रवृत्ति अब दूर होती नजर आ रही है। आज चारों ओर सिर्फ एक ही चर्चा है की कोरोना वायरस से उसी का जीवन बचा रहेगा जिसमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून क्षमता) जितना बेहतर होगा। न किसी की डिग्री काम आ रही है, न योग्यता, न धन-दौलत, न ही गाड़ी और दूकान। सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य ही जीवन की परिभाषा बन गई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने को स्वस्थ रखने के लिए प्रयासरत है। आज मनुष्य अनुशासित जीवन अपना रहा है, क्योंकि उसे पता है कि थोड़ी भी लापरवाही जीवन का अंत कर सकती है। एक सर्वेक्षण द्वारा यह देखा गया कि भारत में 86.2 प्रतिशत लोग अपनी स्वच्छता की ओर जागरुक हो गए है साथ ही 71.5 प्रतिशत लोग साफ-सफाई का पूरा ख्याल रख रहे है (5)।

यज्ञ , योग-आयुर ्वेद बन रहा जीवन का अभिन्न अंग

वर्तमान परिस्थितियों में यज्ञ, योग एवं आयुर्वेद का महत्व हर कोई समझ रहा है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के ये सबसे कारगर उपाय हैं। लोग इसे समझ ही नहीं रहे बल्कि जीवन में उतार भी रहें है। आज सोशल मीडिया योग-आयुर्वेद के प्रचार का नया माध्यम बन गई हैं। यज्ञ-हवन से हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध एवं ‘‘सेनेटाइज’’ हो जाता है, इसके अलावा यज्ञ शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति की इस सबसे प्रमाणिक पद्धति का उपयोग आजकल पुनः घर-घर में होने लगा है। योग हमें कई तरह से स्वस्थ रखने की कोशिश करता है। अभी कोरोना के भय से कई लोगों ने योग करना भी शुरु कर दिया है। लोग योग को महत्व देते जा रहे है जिससे कि वह स्वस्थ रहे और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़े जिससे कोरोना होने की कम संभावना रहे। आयुर्वेद का प्रचार कुछ इस तरह से है कि लोग अब खासी-जुकाम, बुखार या अन्य कोई भी बीमारी से बचने के लिए घरेलु उपाए अपनाते है जैसे तुलसी, शहद, अदरक, हल्दी, आदि का उपयोग करते हुए नजर आ रहे है।

प्रकृति को मिला नया वरदान

लॉकडाउन का सबसे अधिक लाभ यदि किसी को हुआ है तो वह है प्रकृति। प्रकृति अपने अद्भूत सुन्दरता के रंग में रंगी नजर आ रही है। आसमान में तारे बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। पक्षियों - चिड़ियों की चहचहाहट साफ सुनाई देती है। पूरे देश के प्रदूषण में कमी आने से वायु एवं जल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। दिल्ली जैसे गैस चैम्बर माने जाने वाल शहर जो विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में एक है, वहां आजकल दिल्लीवासी विशुद्ध आबोहवा में श्वास ले रहे हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और पी.एम 2.5 में 71 प्रतिशत की गिरावट आई है।

ओजोन परत में सुधार- लॉकडाउन ने धरती के रक्षाकवच कहे जाने वाले ओजोन परत में सकारात्मक बदलाव ला दिया है। दरअसल ओजोन परत को सबसे ज्यादा नुकसान अंटार्कटिका के ऊपर हो रहा था वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस परत में अब उल्लेखनीय सुधार आ रहा है। ब्रिटेन की प्रमुख वैज्ञानिक मैगजीन नेचर में प्रकाशित ताजा शोध के मुताबिक जो केमिकल ओजोन परत के नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं, उनके उत्सर्जन में कमी होने के कारण यह सुधार हो रहा है।

30-50 फीसदी कम हुआ कंपन- कोरोना काल के बीच ज्यादातर देशों में या तो लॉकडाउन है या फिर लोगों को घरों से बाहर नहीं निकलने के आदेश हैं। ऐसे में करीब चार अरब की आबादी वाली आधी दुनिया घरों में बंद है। इस लॉकडाउन ने परिवहन से लेकर उद्योग धंधों की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा दिया है। खास बात यह है कि इन सबकी वजह से धरती का कंपन 30 फीसदी कम हुआ है। जानकारों की मानें तो आगे भी लॉकडाउन बढ़ने से ये कंपन 50 फीसदी तक कम होने की उम्मीद है। तमाम तरह की मानवीय गतिविधियों के चलते धरती कंपकंपाती रहती थी, अब इस कंपन में कमी के बाद भूकंप की वास्तविक स्थिति का पता लगाने में भी मदद मिल रही है (6)।

्रदूषण के स्तर में आयी गिरावट

लॉकडाउन में यह देखने को मिला है कि किस तरह से हमारे देश में प्रदूषण नियंत्रण हुआ है। फैक्ट्रियां, ट्रांसपोर्ट या उत्पादन इकाई के बंद होने के बाद यह देखा गया है कि प्रकृति, जानवरों, पशु-पक्षीयों को काफी राहत मिली है और बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट जो कि लोगों के घरों से निकल रहा है वह काफी लाभदायक हो रहा है प्रकृति के लिए और गैर-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट जिससे नदी, समुद्रों, तालाबों और जानवरों और अन्य सभी चीजो को नुकसान पहुंचता था वह सब अब बंद हो गया है और स्वच्छ हो गए हैं। लॉकडाउन की वजह से धरती पर प्रदूषण में भी जबरदस्त कमी देखने को मिली है। गाड़ियों से निकलने वाले धुएं बंद हैं, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं बंद, वर्क फ्रॉम होम होने के बाद ऑफिस में लगे भारी संख्या में एसी बंद हैं, जिसका साफ असर हवा और हमारे पर्यावरण पर दिख रहा है। अधिकांश जगहों पर हवा पूरी तरह से साफ हो गई है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के प्रदूषण को लेकर रोजाना विश्लेषण में सामने आया कि लॉकडाउन की वजह से अब तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बैंगलूरु की हवा में प्रदूषण का स्तर कुछ कम हुआ है। जानकारी के लिए बता दें सिर्फ भारत में हर वर्ष प्रदूषण की वजह से 12 लाख लोग दम तोड़ते हैं (7)।

मां गंगा एवं अन्य नदियों में बह रही निर्मल धारा

मां गंगा की निर्मल धारा एवं स्वच्छ गंगा देखने का सपना सभी भारतवासी संजोय हुए थे। पिछले 34 सालों में इसके लिए भारत सरकार की तरफ से लगभग 13 हजार करोड़ रूपये खर्च भी किए जा चुके है। लेकिन कुछ नहीं हुआ। परन्तु अब उत्तराखंड प्रदूषण बोर्ड द्वारा लॉकडाउन के दौरान गंगा नदी के पानी की शुद्धता की जांच की गई जिसमें पाया गया कि हरिद्वार एवं ऋषिकेश का पानी जो बी श्रेणी में आता था। अब पीने लायक यानी ए श्रेणी में आ गया है। उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार गंगा इतनी शुद्ध है। सेन्ट्रल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा भी कहा गया की गंगा के 36 मोनेटिंग बिन्दू में 27 की स्थिति अत्यंत बेहतर है।

ग्रेटर फरीदाबाद से होते हुए मथुरा आगरा की तरफ जाने वाली यमुना नदी पहले की अपेक्षा अब करीब 50 से 60 प्रतिशत तक साफ हो गई है लॉकडाउन से पहले यमुना नदी में दिल्ली का कूड़ा कचरा केमिकल का पानी और तमाम पॉलिथीन तैरती हुई नजर आती थी मगर लॉक डाउन के बाद सब कुछ बंद होने के चलते, यमुना नदी का पानी स्वच्छ बहता हुआ दिख रहा है। अन्य नदियों का जल भी बहुत तेजी से शुद्ध हो रहा है। लॉकडाउन ने नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण पर भी काफी हद तक रोक लगा दी है। जानकारों की मानें तो लॉकडाउन के इसी तरह आगे बढ़ने से नदियों का जल भी काफी साफ हो गया है। नदी के तटों पर मानव गतिविधियां भी बंद होने के कारण गंगा, यमुना नदी का जल स्वच्छ हो रहा है।

भारतीय सनातन संस्कृति-संस्कार की तरफ लौटते कदम

भारतीय संस्कृति में ‘परिवार’ समाज की धूरी है। लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर लोग अपने घरवालों के साथ है, ऐसे में अपने परिजनों के साथ सभी अपनी भावनाएं साझा कर रहे है, आपसी मन-मुटाव दूर हो संबंधों की गहराई बढ़ रही है। बड़े-बजुर्गों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। रिश्तों और दोस्ती पर लोगों का भरोसा बढ़ते हुए दिख रहा है। लोग एक दूसरे को समझने लगे हैं। जीवन की भागदौड़ में कई बार बेहद आम लोग भी अपने परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं। यह लॉकडाउन परिवार के साथ वक्त बिताने का भी मौका बन गया है। इसके अलावा, इस वक्त को पुराने दोस्तों और छूट चुके रिश्तेदारों को याद करने और उनसे फोन या मैसेजिंग के जरिये संपर्क करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

रामायण, महाभारत जैसे भारतीय संस्कृति के मूल शास्त्रों को नई पीढ़ी टीवी सीरियल के माध्यम से देख-समझ रही है। इससे लोगों में संस्कृति की समझ विकसित हो रही है। घरों में आस्तिकता का विस्तार हो रहा है। कई लोग खाली समय का सदुपयोग कर वेद, उपनिषद्, पुराण जैसे भारतीय शास्त्रों का स्वाध्याय एवं सत्संग भी कर रहे हैं। कोरोना संकट से पहले कई लोग पश्चिम को श्रेष्ठ मानकर उनका अन्धानुकरण करते थे। परन्तु वर्तमान में यूरोप एवं अमेरिका जैसा देश भारतीय संस्कृति को अपनाकर न सिर्फ अपने संकटकाल को दूर करने के प्रयास में लगा है बल्कि दूसरों को भी भारतीय संस्कृति अपनाने की प्रेरणा दे रहा है। पूरी दुनिया अभिवादन के लिए हाथ जोड़ कर ‘नमस्ते’ करने लगी है। हाथ-पैर धोकर घर में घुसना हो या मृत शरीर को जलाने की प्रक्रिया अब दूसरे देशों में भी इन संस्कारों को अपनाया जा रहा है। अब शाकाहार भोजन की शरण में पूरी दुनिया आ गई है (8)।

दौर वास्तविक नायकों का

लोग फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों, बड़े-बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों, नेताओं को ही सच्चा नायक मानते रहे। पर जनता को अब समझ आ गई है कि कोरोना से लड़ने वाले हमारे योद्धा डॉक्टर-नर्स, पुलिस, सफाईकर्मी, मीडियाकर्मी, मेडिकल-राशन-सब्जी-फल दूकानदार जैसे लोग ही सच्चे नायक है। जो दिन-रात हमारे जीवन एवं सुरक्षा के लिए अपना खून-पसीना एक कर रहे हैं। किसानों के प्रति अन्नदाता के रूप में हमारा सम्मान बढ़ा हैं, जीवन रक्षक अन्न हमें इनकी ही कृपा से मिल रहा है।

हमारा अन्नदाता किसान-हमारे देश का अन्नदाता कड़ी धूप में भी अपने खेतों में काम कर रहा है चाहे सर्दी गर्मी या बरसात हो हमारा अन्नदाता किसान किसी भी परिस्थितियों में अपना काम नहीं छोड़ता अगर वह भी हमारी तरह अपने घर पर बंद हो जाए तो पूरे देश को खाने के लाले पड़ जाएंगे हमारा अन्नदाता सदा ही अपने देश के लिए तत्पर रहता है, रहता था और रहता ही रहेगा। इतिहास गवाह है कि हमारे अन्नदाता ने हमारे देश का सदा से ही भला चाहा है। चाहे वह भारत पाक का युद्ध ही क्यों ना हो 1965 में जब भारत और पाकिस्तान में युद्ध हो रहा था तो उस समय भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री जी थे उन्होंने नारा दिया था ‘‘जय जवान जय किसान’’ उन्होंने न सिर्फ जवान को ही जय कहा बल्कि इस देश के अन्नदाता किसान को भी जय कहा उन्होंने कहा जिस तरह बॉर्डर पर हमारे सैनिक हमारे लिए दिन-रात लड़ रहे हैं उसी तरह किसान हमारे खेत खलिहान में किसी भी मौसम में किसी भी परिस्थितियों में हमारे लिए अन्न पैदा कर रहे हैं। 1965 में हमारे देश के किसानों ने जो योगदान दिया है उसे हम कभी भुला नहीं सकते। ऐसे कितनी परिस्थितियों में हमारे अन्नदाता किसान ने हमारा साथ दिया है। आज पैसों का अनाजों के सामने कोई महत्व नहीं हमारे किसान हमारे अन्नदाता ने कभी भी सरकार से किसी तरह का कोई मांग नहीं किया है, हमारे देश के अन्नदाता किसान हैं तभी हमारा जीवन है चाहें हम कितने ही पैसे कमा ले लेकिन हम भूख लगने पर अनाज को ही खाएंगे। किसानों ने सदा ही इस देश का भला चाहा है।

सामाजिक संवेदना का प्रस्फूटन

आपत्तिकाल में कई हाथ मदद के लिए उठ रहे हैं, लोगों में समाज के प्रति संवेदना बढ़ रही है, कोई गरीब-मजदूरों को भोजन करा रहा है, तो कोई दान देकर जिम्मेदार नागरिक की भूमिका अदा कर रहा है। कई गैर सरकारी एवं धार्मिक संगठन लोगों एवं सरकार की मदद के लिए हर संभव प्रयास करती नजर आ रही है। बड़े-बड़े उद्योगपति, बॉलीवुड स्टार, खिलाड़ी से लेकर आम जनता तक भारत सरकार के पीएम केयर फंड एवं अन्य तरीकों से अपने क्षमता के अनुसार पैसे दान दे रहे है। कोरोना काल में किसी विशेष वर्ग, सम्प्रदाय या जाति को न कोई विशेष सुविधा दिया जा रहा है न ही आरक्षण। सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जा रहा हैं। यही सच्चा समाजवाद है।

लॉकडाउन के कारण कई पर्यटक, किसान, मजदूर और अन्य कई लोग अपने-अपने घर नहीं पहुंच पाए जिसके कारण उन्हें और उनके परिवार वालों को परेशानियों का सामना करना पढ़ रहा है। लोग सहानुभूति दिखाते हुए उनके लिए मदद कर रहे है। जो भी व्यक्ति जहां भी है जो घर नहीं पहुंच पाए है उनके लिए वह लोग खाने-पीने का सामान तैयार करके उन्हें पहुंचा रहे है और जो दिहाड़ी मजदूरों को रोजाना न मिलने पर पैसे और खाने की कमी हो रही है उन तक भी यह सब और जरूरत की चीजे पहुंचाए जा रहे है।

समानता का मिला अवसर

कोरोना काल में किसी विशेष वर्ग, सम्प्रदाय या जाति को न कोई विशेष सुविधा दिया जा रहा है न ही आरक्षण। सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जा रहा हैं। यही सच्चा समाजवाद है। वायरस ने भी अमीर-गरीब, जाति-पाती, धर्म-संप्रदाय आदि में बिना मतभेद किए सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया। जिसने भी लापरवाही बरती उसे वायरस ने अपने प्रभाव में ले लिया। इन दिनों लूटपात, चोरी, भ्रष्टाचार, हत्या, शोषण जैसे सामाजिक बुराईयों में कमी आई है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी यदि ऐसी स्थिति बनी रहे तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण में देर नहीं लगेगी (9)।

सकारात्मक सृजन का पुनःजागरण

वर्तमान में कई लोग अतिरिक्त समय का लाभ अपने अंदर छूपे सृजनात्मकता को उभारने में कर रहे है। कोई पेटिंग, तो कोई खाना बनाने, कोई संगीत के सुरों का अभ्यास कर रहा है तो कोई ऑनलाईन मोटिवेशन कक्षा चला रहा। लॉकडाउन से पहले कई लोग बिना मतलब घरों से बाहर निकलते, अनावश्यक शॉपिंग करते, भूख न लगने पर भी फास्ट-फूड आदि खाते रहते थे। परन्तु अब केवल अपने जरूरत के समान पर ही गुजारा किया जा रहा है। इससे न सिर्फ फिजूल खर्च रूका है बल्कि सादगीपूर्ण जीवन को भी बढ़ावा मिल रहा है। देश भर में जगह-जगह शराब, गुटका, सिगरेट, पान-मसाला जैसे नशीले पदार्थों पर रोक लगता जा रहा है। लोगों को अब पता चल गया है कि इन सबके बगैर भी जीवन जिया जा सकता है। इन दिनों लूटपाट, चोरी, भ्रष्टाचार, हत्या, शोषण जैसे समाजिक बुराईयों में कमी आई है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी यदि ऐसी स्थिति बनी रहे तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण में देर नहीं लगेगी।

नशा-उन्मूलन का दौर- देश भर में जगह-जगह शराब, गुटका, सिगरेट, पान-मसाला जैसे नशीले पदार्थों पर रोक लगता जा रहा है। लोगों को अब पता चल गया है कि इन सबके बगैर भी जीवन जीया जा सकता है। गरीबों के लिए यह सबसे फायदेमंद है क्योंकि इससे इनका पैसा भी बच रहा है और अमीर वर्ग नशा से अपने स्वास्थ पर पडने वाले बुरे प्रभाव पर जागरूक होकर नशा छोड़ रहे है। लॉकडाउन के बाद से यह देखा गया है कि नशा करने वालो की संख्या भी गिर चुकी है। नशा उत्पादन करने वाले सारे कारखाने और परिवहन बंध होने के कारण नशा करने वालों को संख्या कम हो गई। जिससे नशा सेवन करने वाले भी अब स्वस्थ होते जा रहे है। जहां धूम्रपान के सेवन की वजह से लोगों पर जान का खतरा ज्यादा होता था वहीं कोरोना के वजह से इसके सेवन में बहुत गिरावट आया। सरकार ने इन सब पर रोक लगा दिया है जिससे बीमारियों की संख्या में गिरावट आयी है।

आहार-विहार में बदलाव-शाकाहार

आज पूरा विश्व जानता है कि कोरोना जैसा वायरस पशु-पक्षी, जीव-जन्तुओं के माध्यम से ही मानव शरीर में प्रवेश करता है। एवं इसका सबसे पहले शिकार मांसाहार भोजन करने वाले लोग ही होते है। भारतीय संस्कृति में शाकाहार भोजन करने का ही निर्देश है, क्योंकि हमारी संस्कृति इन सब कारणों से अनभिज्ञ कभी नहीं रही। आज पूरी दुनिया भारतीय संस्कृति के इस ज्ञान को मानकर मांसाहार भोजन से अपनी दूरी बना रही है।

कोरोना के भय से लोगों के खाने-पीने में भी कई बदलाव देखा जा रहा है। लोग घरों में है इसलिए वह मांसाहारी भोजन ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं जिससे लोगों को अन्य बीमारियां भी नहीं हो रही है। लोग घर का बना सादा भोजन ही खा रहे है जिससे की वह स्वस्थ होते जा रहे हैं। घरों में रह कर अपने भोजन को भी सही वक्त पर ग्रहण कर रहे है। जहां आज की पीढ़ी पिज्जा और बर्गर के आदतों से घीरें हुए है वहीं आज वह सब सब्जी और फलों का सेवन अधिक कर रहे है (10)।

लॉकडाउन से पहले लोग बिना मतलब घरों से बाहर निकलते थें, अनावश्यक शॉपिंग करते थे, भूख न लगने पर भी फास्ट-फूड आदि खाते रहते थे। परन्तु अब केवल अपने जरूरत के समान पर ही गुजारा कर रहे है। इससे फिजूल खर्च रूका है एवं सादगीपूर्ण जीवन को अपनाया जा रहा है। हम सभी को यह चीज़ समझना चाहिए कि जितना हम अपने जीवन में सादगी से रहेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा। अगर हम सादा भोजन का सेवन करेंगें तो हम बीमार कम पड़ेंगे और हमें डॉक्टर की जरुरत भी नहीं पड़ेगी और कोरोना से भी दूर रहेंगें। हमें अपने सोच को सकारात्मक रखना अनिवार्य है। हमारे रहन-सहन को भी जितनी सादगी से रखेंगें हमें उतना ही लाभ होगा।

भारतीय संस्कार और संस्कृति को अपना रही है पूरी दुनिया:-

भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का महत्व भी समझाया गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से व्रत के दौरान हमारा शरीर स्वयं का शोधन करता है। जिससे शरीर की कई बीमारियां स्वतः ठीक हो जाती हैं। आज हाथ मिलाने की जगह हाथ जोड़कर प्रणाम करने, शाकाहार अपनाने, मृत व्यक्तियों का दाह संस्कार करने जैसी भारतीय सनातन पंरपरा की तारीफ अमेरिका, स्पेन, इटली, जापान, कोरिया और जर्मनी के लोग भी कर रहे हैं और इसे अपनाने की वकालत भी कर रहे हैं। वही अगर हम रेडियो और टेलिविजन की बात करें तो भारत मे रेडियो सुनने वाले की संख्या 22% से बढ़कर 86% हो गई है। टेलिविजन पर भी रामायण और महाभारत को दूसरी बार प्रसारित किया गया। 7.7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने इसे देखा। पौराणिक कार्यक्रमों को जैसे रामायण और महाभारत को दर्शकों का साथ मिला।

रामायण, महाभारत जैसे भारतीय संस्कृति के मूल शास्त्रों को नई पीढ़ी टीवी सीरियल के माध्यम से देख समझ रही हैं। इससे लोगों में संस्कृति की समझ विकसित हो रही है। घरों में आस्तिकता का विस्तार हो रहा है। इसका प्रमाण यह है कि वर्तमान समय में टीवी पर देखे जाने वाला सबसे लोकप्रिय शो यहीं है। कई लोग खाली समय का सदुपयोग कर वेद, उपनिषद्, पुराण जैसे भारतीय शास्त्रों का स्वाध्याय एवं सत्संग भी कर रहे हैं।

निष्कर्ष

कोरोनासंकट काल में जिस प्रकार संचार एवं पत्रकारिता ने अपने कर्तव्य को समझा और जिस कौशल पूर्ण तरीके से अपनी भूमिका निभाई वो वाकई काबिले तारीफ है। इस संकट काल में जहां एक ओर संचार माध्यमों द्वारा कोरोना यानी कोविड-19 से हो रही हानियों, मुख्यतः बीमारी से होने वाली जन हानी के आंकड़े बता रहे हैं पर साथ ही इससे बचने के उपाय, सावधानियाँ भी बात रहे हैं। साथ ही इससे जुड़े सभी आयामों को बताया-समझाया जा रहा है जैसे- स्वस्थ कैसे रहे, योग व्यायाम के साधन, धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन, घर रहकर क्या नया कर सकते है इसके वीडियो आदि प्रसारित किए जा रहे है। जिससे समाज में संकट को सही से समझने तथा उससे लड़ने के लिए तैयार होने के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से तैयार हुए हैं।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आपदाओं के समय सकारात्मक संचार एवं पत्रकारिता लोगों को न सिर्फ मानसिक बल प्रदान करता है, बल्कि उज्जवल भविष्य की ओर भी ले जाता है। लोगों को भय, निराशा, आतंक के माहौल से निकालकर उनमें आत्मबल, साहस, निर्भयता, आशावाद जैसे उच्च आदर्शों का संचार करता है। इन परिस्थितियों में जो मनुष्य सकारात्मक रहकर कार्य करेगा, उसके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन तो होकर ही रहेगा।

References

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  4. Singh S. Value As The Core Tenet For Quality Media Education - Need, Challenges And Future: With Special Reference To Dev Sanskriti University’s Value Based Education. Dev Sanskriti Interdis Internat J. 2020;15:01-6. https://doi.org/10.36018/dsiij.v15i.136
  5. Chaudhary sudhir, Zee News, DNA program, 9 P.M, 22-4-2020
  6. Singhal Atul. Earth day 2020: पर्यावरण पर लॉक डाउन के सकारात्मक प्रभाव, हर साल 15 दिन की संपूर्ण छुट्टी की ठोस योजना बने. https://www.amarujala.com/columns/blog/india-s-fight-against-coronavirus-lockdown-positive-impact-on-pollution-and-society-in-india?pageId=1 (accessed 22 April 2020)
  7. Mishra Anjali. पांच सकारात्मक बदलाव जो कोरोना संकट की वजह से देखने को मिल रहे हैं. https://satyagrah.scroll.in/article/134879/corona-sankat-sakaratmak-badlav (accessed 30 March 2020)
  8. Sharma Mohit. Coronavirus: लॉकडाउन ने बदली लोगों की जीवनशैली, कहीं अच्छे तो कही बुरा प्रभाव. https://m.patrika.com/miscellenous-india/coronavirus-lockdown-changed-people-s-lifestyle-completely-5997974/ (accessed 13 April 2020)
  9. Salahuddin M. कोविड-19 के दौरान कर सकते हैं फ्रीलांसिंग की ये जॉब. https://navbharattimes.indiatimes.com/education/jobs-junction/best-freelancing-jobs-during-covid-19-crisis/articleshow/75554450.cms (accessed 5 May 2020).
  10. Mair Simon. How will coronavirus change the world? https://www.bbc.com/future/article/20200331-covid-19-how-will-the-coronavirus-change-the-world (accessed 31 March 2020)