हठयौगिक ग्रंथों में कफ संबंधी दोषों को दूर करने के लिये वर्णित यौगिक विधिया : कोविड-19 महामारी के विशेष संदर्भ में
Research article
DOI: 10.36018/dsiij.v16i.153

हठयौगिक ग्रंथों में कफ संबंधी दोषों को दूर करने के लिये वर्णित यौगिक विधिया : कोविड-19 महामारी के विशेष संदर्भ में

इन्द्राणी त्रिवेदी, सहायक आचार्या, मानव चेतना एवं योग विज्ञान विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार
आयुर्वेद एवं समग्र स्वास्थ्य विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार
Bio
कोविड-19 हठयोग कफ संबंधी दोष, षट्कर्म प्राणायाम ध्यान आसन

Abstract

योग एक प्राचीन विद्या है जिसका अभ्यास सहस्रों शताब्दियों से आत्म कल्याण हेतु किया जाता रहा है। आत्मकल्याण का सार मानव कल्याण में निहित है इन ।दोनों ही उद्देश्यों की प्राप्ति योग के द्वारा हो सकती है। वर्तमान समय में व्याप्त कोविड-19 (कोरोना वायनस डिसीज-19) रोग के संभावित समाधान के रूप में योगाभ्यास एक प्रभावी साधन सिद्ध हो सकता है। योग केवल शरीर को ही स्वस्थ नहीं बनाता अपितु मन को भी स्वस्थ करता है। योग रूप ज्ञान गंगा की विभिन्न धाराएं हैं जैसे हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग। इनमें से हठयोग व्यावहारिक स्तर पर किया जाने वाला एक अभ्यास है जिसका सिद्धांत है कि शरीर के माध्यम से मन और आत्मा को भी विकसित किया जा सकता है। भारतीय ज्ञान के अक्षय भण्डार में समग्र समस्याओं का हल निहित है। योग तथा आयुर्वेद के माध्यम से विभिन्न समस्याओं का समाधान  मिलता रहा है। प्रस्तुत शोध पत्र में कफ दोषों को दूर करने के लिए हठयोग के ग्रंथों में वर्णित अभ्यासों का समावेश किया गया है जिसके ज्ञान से प्रबुद्ध जनसामानान्य लाभान्वित हो सके। इन योगाभ्यासों के अंतर्गत षट्कर्म, आसन, मुदा-बंध तथा ध्यान जैसे अभ्यासों का वर्णन किया गया है । ये सभी अभ्यास कोरोना जैसे महामारी के लिए एक संभावित सहायक चिकित्सा पद्धति सिद्ध हो सकती है।

प्रस्तावना

वर्तमान परिस्थितियों में एक भयानक महामारी कोविड-19 कोरोना के रूप में एक वैश्विक समस्या का रूप ले चुकी है अभी तक इसका कोई भी स्थाई निराकरण नहीं हो सका है। इसका समाधान मात्र सावधानी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ऐसे समय में भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति की ओर निहारने पर थोड़ी सी उम्मीद की किरण दिखाई पड़ रही है जो योग एवं आयुर्वेद जैसे गूढ़ विद्या में निहित है।

कोविड-19 संसार के लिए विकट समस्या है, यह चीन के वुहान से लेकर चलकर संपूर्ण संसार फैल में चुकी है। यह समस्या इतनी विकट और विकराल हो चुकी है, अब तक संपूर्ण विश्व के मनुष्य काल के गाल में लगभग डेढ़ लाख से अधिक लोग समा चुके हैं एक रिपोर्ट के अनुसार 29 मई 2020 तक संक्रमित व्यक्ति 5,925,659 तथा मुत्यु प्राप्त व्यक्ति 362,555 हैं (1)।

इस समस्या का अभी तक इसका कोई आदि और अंत नहीं दिख रहा पा रहा है विज्ञान भी अभी इसके कारण तक पहुंचने में असमर्थ रहा है, केवल जानकारी के तौर पर इतना ही पता चल सका है यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सांस के माध्यम से संपर्क के माध्यम से आसानी से फैल रहा है।

गिरीश एवं अन्य ने अपने एक शोध पत्र में बताया है कि कोविड-19 महामारी में आयुर्वेद तथा योग एक सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में उभर रहा है (2) । आयर्वेद के औषधीय प्रभाव से रोगी के प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत बनाया जाता है तथा योग के द्वारा शारीरिक तथा मानसिक स्तर सबल बनता है। कोविड-19 के उपचारात्मक विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा दी गई मार्गदर्शिका में स्वच्छता का विशेष ध्यान देने को कहा गया है, क्योंकि इसे संक्रामक रोग मांना गया है। (3)। परंतु पाश्चात्य परंपरा की अंधी दौड़ में मनुष्य मात्र ने भारतीय संस्कृति की उपेक्षा की है जिसके परिणाम स्वरूप हम आज संक्रामक रोग से लड़ने के लिए पुनः प्रशिक्षण लेकर अपने जीवन की रक्षा करने को विवश है। हमें आज पुनः भारतीय संस्कृति भारतीय साहित्य भारतीय परंपरा की ओर पैनी दृष्टि से देखने की जरूरत है। इसी क्रम में भगवान शिव द्वारा प्रदत्त ज्ञान के अंतर्गत हठयोग के ग्रंथों में षट्कर्म, आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि चिकित्साओं का प्रयोग किया जा सकता है।

तनाव और अवसाद में मानसिक अस्वस्थता की स्थिति उत्पन्न होती है जो तीव्र श्वसन संक्रमण का खतरा बन सकता है (4)। प्राणायाम के द्वारा फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार होता है (5)। ध्यान एक विशिष्ट प्रतिरोधी क्षमता के रूप में कार्य करता है (6)।

कोरोना जैसी महामारी से लडने में में योग चिकित्सा एक सहज व सरल चिकित्सा सिद्ध हो सकती है। अतः प्रस्तुत शोध में इस प्रकार के कुछ विशिष्ट योगाभ्यासों का हठयौगिक ग्रंथ के संदर्भ में विवेचन किया गया है। है

हठयोगः परिचय

योग एक प्राचीन विद्या है। योग के विभिन्न अभ्यास जैसे आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि प्रचलित साधनाएँ अमूल्य धरोहर के रूप में रही है, जिसका प्रमाण विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। योग की अनेक शाखाएं हैं जैसे हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, ज्ञान योग, भक्ति योग, लय योग, कुंडलिनी योग आदि। मंत्रयोग, हठयोग, लययोग, राजयोग मुख्य चार प्रकार के योग हैं (7)।

हठयोग व्यावहारिक अभ्यास की प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति शरीर की शुद्धि के माध्यम से आत्म शुद्धि कर सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता-6/34 के अनुसार मन का नियंत्रण कठिन है (8), जिसे अपने मन पर नियंत्रण नहीं उसे मन की शांति नहीं मिल सकती। जिसे मन की शांति नहीं उसे सुख कैसे मिल सकता है (9)। अतः एक सामान्य मनुष्य शरीर की शुद्धि करके, रोगरहित होकर सरलता पूर्वक आत्मशांति प्राप्त कर सकता है। हठयोग की उत्पत्ति आदिनाथ शिव द्वारा हुई है।

हठयोग की परिभाषा

हठ शब्द में 2 वर्ण हैं - ह और ठ जिनके निम्न अर्थ है। ‘हकार: कीर्तित: सूर्यष्ठकाश् चंद्र उच्यते। सूर्याचंद्रमसो योगात् हठयोगो निगद्यते’ - सिद्ध सिद्धांत पद्धति-1/69। हकार को सूर्य, तथा ठकार को चंद्र कहा गया है। हकार और ठकार का योग ही हठ साधना है (10)।

‘ह’ कार ‘ठ’ कार
सूर्य चंद्र
पिंगला इड़ा
दिन रात
शिव पार्वती

हठयोग ग्रंथों में वर्णित चिकित्सा

कोविड-19 महामारी के लक्षण लोगों में निम्न रूप से जाने जा सके हैं जैसे तीव्र ज्वर का आना, खांसी-कफ का होना, नासिका द्वारा द्रव्य का बहना, निर्जलीकरण व उल्टी आदि का होना आदि लक्षण के रूप में जाने जा सके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुख्यतः गले से प्रारंभ होकर फेफड़े में पहुंचकर समस्या उत्पन्न करता है, कुछ ही दिनों में शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता का क्षरण कर मनुष्य को मृत प्राय कर देता है।

योग के विभिन्न ग्रंथों जैसे घेरंड संहिता, वशिष्ठ संहिता, हठ प्रदीपिका, हठरत्नावली, सिद्ध-सिद्धांत पद्धति, गोरख संहिता में वात पित्त तथा कफ संबंधी दोषों को दूर करने की ऐसी विशिष्ट विधाएं वर्णित है, विशेषकर कफ की अधिकता होने पर षट्कर्म का अभ्यास बताया गया है, साथ ही अन्य अभ्यास जैसे आसन‚ प्राणायाम‚ ध्यान आदि कोरोना जैसे संक्रामक रोगों में अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हो सकते है। विभिन्न ग्रंथों में संदर्भित योगाभ्यास का वर्णन निम्न प्रकार है।

षट्कर्म

इसके अंतर्गत 6 प्रकार की शुद्धि क्रियाओं का वर्णन है (11) – ‘धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते’- हठ प्रदीपिका 2/22।

धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि तथा कपालभाति ये छः क्रियाएं हैं। इनसे शरीर के सभी अंगों की सफाई होती है। शीर्ष प्रदेश से लेकर गुदा मार्ग की शद्धि हेतु चार पदार्थ प्रयुक्त होते हैं - 1. जल, 2. कपड़ा, 3. वायु, 4. अग्नि जठराग्नि।

इन सभी षट्कर्मो का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है –

धौति इससे अमाशय और अन्न नलिका की सफाई होती है।
बस्ति यह एक यौगिक एनिमा है। गुदा द्वार से जल खींचकर बड़ी आंत की सफाई की जाती है।
नेति इसके द्वारा नाक, कान और गले की सफाई होती है।
नौलि यह पेट की सभी अंगों की मालिश करता है। पाचन संबंधी दोष दूर होता है।
त्राटक इस क्रिया से नेत्रों व तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग दूर होता है।
कपालभांति यह विशेषकर फेफड़ों से संबंधित विकारों को दूर करने में प्रभावी अभ्यास है। साथ ही साथ रक्त भी शुद्ध होता है। यह अभ्यास प्राणायाम के रूप में भी किया जाता है।

घेरंडसंहितामेंवर्णितकफसंबंधीदोषोंकोदूरकरनेकेलियेधौतिप्रक्रिया

  1. जिव्हा मूल धौति - जिव्हा शुद्ध होने पर जिव्हा की लंबाई बढ़ती है। इसके लिए तर्जनी‚ मध्यमा‚अनामिका तीनों उंगलियों कंठ में डालकर जिव्हा के जड़ की सफाई करें। सफाई के बाद थोड़ा मक्खन लगाकर दूध दुहने जैसी क्रिया करते हैं। इस अभ्यास से व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु को दूर किया जा सकता है।
  2. कपालरंध्र धौति - इस अभ्यास के लिए दाहिने हाथ की उंगलियों को समेटकर एक कप की आकृति बनाकर पानी भर कर कपाल रंध्र (ब्रह्म रंध्र) में थपकी दी जाती है। इस अभ्यास के द्वारा कफ दोष से मुक्ति, सिर के ऊपर भाग की नाड़ियां निर्मल होती हैं।
  3. हृद्धौति - इसका अर्थ है हृदय क्षेत्र के आसपास के अंगों की सफाई। इसके तीन भेद है - दंड धौति, वमन धौति, वस्त्र (वसन) धौति।
  4. दंड धौति - इस अभ्यास के लिए केले, हल्दी के कोमल डंडे (बेंत) को मुख द्वारा अमाशय में डालकर कर धीरे धीरे निकालना चाहिए। फिर कफ, पित्त, क्लेद (श्लेष्मा) का मुख से रेचन। आधा इंच व्यास का डंडा, लंबाई लगभग 4 - 5 इंच लंबा किंतु वर्तमान में रबर के कैथेटर का प्रयोग किया जाता है।
  5. वमन धौति - वमन का सामान्य अर्थ है कै (उल्टी) करना। भोजन के अंत में कंठ तक जल पीकर, क्षणभर ऊपर देखने के बाद वमन से निकाल देना चाहिए। यह अभ्यास कफ पित्त नाशक है। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती (12) ने घेरण्ड संहिता की व्याख्या में वमन धौति के दो प्रकार बताएं हैं -1. कुंजल क्रिया (खाली पेट - स्वस्थ स्थिति में भी), 2. व्याघ्र क्रिया - भोजन के बाद (रोग की अवस्था में)
  6. वस्त्र धौति - इसके द्वारा गले व अन्न नलिका, आमाशय को कपड़े द्वारा साफ किया जाता है। इस अभ्यास के लिए चार अंगुल चौड़ा (लगभग 2 इंच तथा लंबाई लगभग 6-7 गज)। महीन वस्त्र धीरे-धीरे निगलना चाहिए फिर बाहर करना चाहिए। इस अभ्यास के द्वारा गुल्म, ज्वर, प्लीहा, कुष्ठ, कफ, पित्त विकार का शमन होता है। आरोग्य व बल की वृद्धि होती है।

हठ प्रदीपिका में वर्णित कफ संबंधी दोषों को दूर करने के लिये प्रक्रियाएं

वस्त्र धौति के अभ्यास से खासी, दमा, तिल्ली, कुष्ठ, 20 प्रकार के कफ रोग दूर होते हैं। बस्ति - इसके अंतर्गत जल बस्ति का वर्णन किया गया है। इस अभ्यास के लिए उत्कटासन बैठकर में गुदा का संकुचन किया जाता है। वायु गोला, दिल्ली, जलोदर, वात पित्त कफ जन्य रोग अभ्यास से दूर होते हैं (11) (पृ. 46- 48)।

हठरत्नावली में शुद्धि क्रिया के लिए अष्टकर्म

हठरत्नावली ग्रंथ के प्रणेता श्रीनिवास भट्ट जी हैं। इसमें शुद्धि क्रिया के लिए अष्टकर्म का वर्णन है। अष्टकर्म का अर्थ है आठ प्रकार की क्रियाएं जिनके द्वारा शरीर की शुद्धि की जाती है। ये अष्टकर्म हैं- चक्रि, नौलि, धौति, नेति, वस्ति, गजकरणी त्राटक, मस्तकभ्रांति। यहां गजकरणी वमन धौति की तरह है तथा मस्तकभ्रांति का अर्थ कपालभांति ही है (13)।

श्रीनिवास भट्ट जी ने इनमें से चक्रि कर्म को सबसे महत्वपूर्ण बताया है।

कफ दोष की निवृत्ति के लिए वस्त्र धौति का अभ्यास बताया गया है। श्रीनिवास भट्ट के अनुसार इसके अभ्यास से 20 प्रकार के कफ संबंधी रोगों की निवृत्ति होती है।

इसके अतिरिक्त जल बस्ति का भी वर्णन किया गया है। इस अभ्यास के लिए नाभि तक जल होना चाहिए, विचित्र करणी करके जल को बाहर करना चाहिए। बस्ति के बाद तीन घड़ी (72 मिनट) तक खाना नहीं चाहिए। इसका लाभ है की गुल्म रोग, प्लीहा रोग, वात पित्त कफ का नाश, पेड़ू के रोग, अंतःकरण प्रकाशित, जठराग्नि प्रदीप्त, जीर्ण रोग शांत होते हैं।

षट्कर्म के शारीरिक एवम मानसिक स्तर पर प्रभाव पर हुए शोध कार्य

मान, ए. तथा बलोदी, एच. (14) ने अपने शोध में 60 प्रयोज्यो को 12 सप्ताह तक षट्कर्म का अभ्यास कराया, जिसमे वस्त्र-धौति, जल-नेति, वस्ति, शंख-प्रक्षालन, त्राटक, नौलि, अग्निसार का चयन किया गया था। प्रयोज्यो को दो समूह (प्रायोगिक और नियंत्रित) में विभाजित किया गया था शोध के परिणाम से ज्ञात हुआ कि षट्कर्म के अभ्यास से प्रसन्नता स्तर में वृद्धि होती है।

पात्रा, एस. के. (15) ने बताया है कि षट्कर्म का शारीरिक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार शेल्के, एस ए (16) ने कुंजल का प्रभाव मोटापा रोग पर देखा; अध्ययन से ज्ञात हुआ की कुंजल जिसे हठयोग के ग्रंथो में वमन-धौति के रूप में बताया है, का अभ्यास करने पर काफ दोष में कमी आती है तथा स्थूलता कम होती है। इस प्रकार इन सभी शोध अध्ययनों से यह ज्ञात होता है की षट्कर्म अर्थात शुद्धि प्रक्रियाओं का शरीर के साथ-साथ मन पर भी सकारात्मक पराभव पड़ता है।

आसन

आसनों के द्वारा शारीरिक स्थिरता के साथ-साथ मानसिक स्थिरता भी होती है। घेरण्ड संहिता में श्वसन संबंधी तथा कफ संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ विशिष्ट आसनों का वर्णन भी मिलता है।

  1. गोमुखासन - गौ के मुख की भांति पैरों के घुटनों को रखते हुए हाथों को पीठ के पीछे रखते हैं। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार यह अभ्यास फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है (11) (पृ. 147-148)।
  2. मत्स्यासन - पद्मासन की स्थिति में लेट जाते हैं तथा हाथों से पैर के अंगूठे पकड़ते हैं। सावधानियां हैं हृदय रोग हर्निया अल्सर गंभीर रोग तथा गर्भवती महिलाएं न करें। इसके अतिरिक्त अनेक आसन भी हैं जिनका श्वसन तंत्र पर प्रभाव पड़ता है।

प्राणायाम

यह एक उच्चस्तरीय अभ्यास है जिसके द्वारा प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन होता है। स्थूल रूप में यह हमारे श्वसन तंत्र में कार्यरत हैं किन्तु सूक्ष्म रूप में यह समग्र शरीर को क्रियान्वित करने में योगदान देता है। फलस्वरूप प्राणायाम के अभ्यास से जीवनीशक्ति का अभिवर्द्धन होता है। सेनगुप्ता, पी (17) ने अपने अध्ययन में पाया कि प्राणायाम जैसे योग के अभ्यास के द्वारा विभिन्न रोगो का निदान प्राप्त कर सकते है योगाभ्यास से न्यूरो-हार्मोनल स्तर में संतुलन होता है तथा तंत्रिका तंत्र सबल होता है इस प्रकार किसी भी रोग के होने के पूर्व ही हम शरीर और मन की संतुलित स्थिति प्राप्त कर सकते है। यही नहीं, हम गंभीर रोगो जैसे कैंसर पर भी कुछ सीमाओं तक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

प्राणायाम को महर्षि पतंजलि (18) परिभाषित करते हैं कि ‘तस्मिन सति श्वासप्रष्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः’ - पा. यो. सू. 2/49 आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास की गति का स्थिर हो जाना प्राणायाम कहलाता है।

प्राणायाम से मन भी नियंत्रित होता है। हठ प्रदीपिका में यहां तक कहा गया है कि वायु के चलायमान होने पर चित भी चलायमान होता है तथा वायु के स्थिर हो जाने पर चित्त भी स्थिर हो जाता है (11) (पृ. 35)। 'चले वाते चलं चित्तम निश्चले निश्चलम भवेत्' - हठप्रदीपिका 2/2 महर्षि पतंजलि (18, पृ. 67 )कहते हैं प्राणायाम के द्वारा धारणा हेतु मन की योग्यता प्राप्त होती है तथा ज्ञान के आवरण का नाश होता है - पा.यो.सू. -2/53-54। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राणायाम का प्रभाव केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं अपितु मानसिक स्तर पर भी पड़ता है।

योगबीज के अनुसार प्राणायाम

यह ग्रंथ आदिनाथ शिव जी द्वारा प्रणीत है जिसमें उन्होंने पार्वती जी को हठयोग का ज्ञान दिया है। इस ग्रंथ में चार प्राणायामों का वर्णन है- सूर्यभेद, उज्जायी, शीतली तथा भस्रिका प्राणायाम। इनमें से सूर्यभेद‚ उज्जायी तथा भस्रिका प्राणायाम कफजन्य रोगों में लाभप्रद बताया गया है (19)।

कफ संबंधी दोषों का नाश करने वाले कुछ विशेषकर प्राणायाम

इस अभ्यास के लिए मुख को बंद करके नासिका मार्ग से कुछ आवाज के साथ धीरे-धीरे श्वास लिया जाता है तथा बाएं नासिका से किया जाता है। हठ प्रदीपिका (11) (पृ. 57-58)में दी गई विधि के अनुसार रेचक की प्रक्रिया बाएं नासिका इड़ा नाड़ी से की जाती है। घेरंड संहिता में वर्णित उज्जायी प्राणायाम में अंत: कुंभक में जालंधर बंध का प्रयोग बताया गया है। इस अभ्यास के द्वारा कफजन्य कंठ दोष दूर होता है और जठराग्नि प्रदीप्त होती है। किंतु कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना चाहिए, जो ह्रदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को बंधन कुंभक के साथ इस प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। स्लिप डिस्क और कशेरूका संधि शोथ की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास मकरासन में कर सकते हैं।

घेरंड संहिता वर्णित में शीतली प्राणायाम की विधि है - जिव्हा को नलीनुमा बनाते हुए मुख से पूरक किया जाता है तथा कुछ समय तक कुंभक करने के बाद नासिका मार्ग से रेचक किया जाता है। इस स्थिति में मुख को बंद रखा जाता है। इस अभ्यास के लिए कोई विशेष सावधानी नहीं बताई गई है। इस अभ्यास के द्वारा भी कफ दोष दूर होते हैं (12) (पृ. 321-322)।

  1. उज्जायी प्राणायाम
  2. शीतली प्राणायाम
  3. भस्त्रिका प्राणायाम

हठ प्रदीपिका (11, पृ. 64) के अनुसार यह प्राणायाम कफजन्य विकारों के लिए लाभप्रद है। इसके अभ्यास के लिए पद्मासन की स्थिति बताई गई है। मुंह बंद करके के साथ नासिका से रेचक जिसका अनुभव हृदय और कपाल तक होना चाहिए। इसी प्रकार वेग पूर्वक आवाज के साथ पूरक की क्रिया और पुनः रेचक की क्रिया। अर्थात बार-बार पूरक रेचक की क्रिया करते हैं। ऐसा करने पर जब शरीर में थकान आती है तो दाएं नासिका से पूरक करने के पश्चात कुंभक करते हैं तथा तत्पश्चात बाएं नासिका से रेचक किया जाता है तब यह प्राणायाम पूर्ण होता है। इस अभ्यास के द्वारा वात पित्त और कफ संबंधी समस्या दूर होती है। किंतु इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि श्वास की गति को नियंत्रित करते हुए प्राणायाम करें बलपूर्वक श्वसन ना करें। प्रारंभिक स्तर के अभ्यास में प्रत्येक आवृत्ति के पश्चात विश्राम करना चाहिए। उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए। दमा, ब्रोंकाइटिस, टीबी, यक्ष्मा से पीड़ित कुशल मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए। गर्मी के दिनों में यह अभ्यास कम करना चाहिए।

मुद्रा एवं बंध

मुद्रा एवं बंध का संबंध शरीर में स्थित सूक्ष्म शक्ति केंद्रों से है। मुद्रा बंध के द्वारा इन स्थानों को जागृत और क्रियान्वित किया जाता है जिसके द्वारा स्थिरता की प्राप्ति होती है। घेरंड संहिता (12) (पृ. 205) में 25 बंध एवं मुद्राओं का वर्णन है जिनके द्वारा सर्दी आदि 20 प्रकार के कफ दोष की भी निवृत्ति होती है।

25 मुद्राएं इस प्रकार हैं - महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियान, जालंधर, मूलबंध, महाबंध, महाबेध, खेचरी, विपरीत करणी, योनि-मुद्रा, वज्रोणी, शक्ति चालिनी, ताड़ागी, मांडूकी, शांभवी, 5 धारणाएं (पार्थिवी, आम्भसी, आग्नेयी, वायवीय, आकाशी), अश्विनी, पाशिनी, काकी, मातंगी, भुजंगिनी मुद्रा।

इनमें से कुछ सरल मुद्राओं का वर्णन इस प्रकार है जिसे व्यक्ति सरलता पूर्वक कर सके।

  1. मूलबंध के अभ्यास के लिए गुदा एवं प्रजनन अंग के मध्य स्थान का संकुचन किया जाता है।
  2. जालंधर बंध के अभ्यास में ठुड्डी को गले के नीचे कंठकूप में लगाते हैं।
  3. उड्डीयान बंध के अभ्यास हेतु पेट को पीछे करते हुए ऊपर की तरफ खींचते हैं। खेचरी मुद्रा के अभ्यास के लिए जीभ के अग्रभाग से तालु को स्पर्श करते हैं।
  4. शांभवी मुद्रा में दोनों आंखों की पुतलियों को आज्ञा चक्र की ओर करते हुए भ्रू मध्य को देखने का प्रयास किया जाता है।
  5. काकी मुद्रा के लिए होठों को कौवे के चौथ की आकृति देते हुए मुख के द्वारा पूरक करना तथा नासिका मार्ग से रेचक करते हैं।
  6. अश्विनी मुद्रा के अभ्यास के लिए गुदा का संकुचन एवं प्रसारण करते हैं।

इन अभ्यासों के द्वारा केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं अपितु मानसिक स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। एक शोध (20) के परिणाम में बताया गया है कि मूलबन्ध का 30 दिनों तक अभ्यास करने पर शोध से ज्ञात हुआ कि श्रोणि प्रदेश से समबन्धित समस्या के लिए लाभप्रद होता है। इसी प्रकार एक अन्य शोध के प्राप्त परिणाम के अनुसार शाम्भवी मुद्रा के द्वारा तनाव पर तथा जनरल वेल बीइंग पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है (21)।

ध्यान

कोविड-19 जैसे रोग की स्थिति में मानसिक तनाव भी उत्पन्न हो जाता है, जिसमें यह अभ्यास सहायक सिद्ध हो सकते हैं। ध्यान का संबंध मन से है और मन की महिमा प्रत्येक महापुरुष और प्रत्येक ग्रंथों द्वारा वर्णित है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि विषम परिस्थितियों में यदि मन सकारात्मक हो तो उन परिस्थितियों को भी सकारात्मक बनाया जा सकता है। साथ ही साथ मन की दृढ़ इच्छाशक्ति होने पर प्रतिरोधी क्षमता में भी वृद्धि हो सकती है। कहा भी गया है मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन को सही दिशा देने के लिए तथा मन को श्रेष्ठ विचारों में स्नान कराने के लिए ध्यान की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विभिन्न ग्रंथों में ध्यान के अलग-अलग प्रकारों व विधियों की चर्चा है। प्रमुखतः ध्यान के दो प्रकारों की चर्चा है - साकार व निराकार। साकार ध्यान में व्यक्ति किसी भी इष्ट, देवता, आदि को लक्ष्य करके ध्यान कर सकता है। निराकार ध्यान में किसी भी सूक्ष्म लक्ष्य को ध्यान का विषय बनाया जाता है। जैसे प्रकाश, ज्योति आदि का ध्यान। ध्यान हेतु 10 मिनट 30 मिनट के मध्य की अवधि निर्धारित की जा सकती है।

उपसंहार

निष्कर्ष रूप में यह स्पष्ट है कि कोविड-19 का स्थाई समाधान अभी तक नहीं है किंतु योग एवं आयुर्वेद के द्वारा कुछ हद तक इसे दूर किया जा सकता है। योग एक आदर्श एवं उपयुक्त जीवन शैली की पद्धति है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने जीवनी शक्ति तथा प्रतिरोधक शक्ति को विकसित कर सकता है। योगाभ्यास के द्वारा शरीर के विभिन्न तंत्रों को सक्रिय बनाया जाता है साथ ही विजातीय तत्वों का भी निष्कासन भी होता है।

हठयोग एक व्यावहारिक योगाभ्यास की प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत षट्कर्म, आसन, प्राणायाम आदि अभ्यास समस्त शरीर अंगो की शुद्धि करते हैं। कोविड-19 से पीड़ित व्यक्ति की प्रतिरोधी क्षमता कम होती है तथा श्वसन तंत्र कमजोर होने लगता है। हठयोग के अंतर्गत ऐसे अनेक अभ्यास हैं जिनके द्वारा श्वसन तंत्र मजबूत बनाया जा सकता हैं, साथ कफ संबंधी दोष भी दूर होते हैं। इस रोग से ग्रसित होने के पूर्व ही यदि व्यक्ति उचित आहार-विहार के साथ-साथ योगाभ्यास करते हुए इन्हें जीवन का अनिवार्य अंग बना सके तो निश्चित ही वह कोविड-19 जैसे महामारी से लड़ने में सक्षम हो सकता है।

References

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